दीवार पर टंगे महात्मा गांधी: तस्वीर, तहसील और उस आख़िरी आदमी का सवाल

-Ayush Krsihna Tripathi प्रिय महात्मा गांधी जी, आज सुबह मैं तहसील दफ़्तर गया था, दीवार पर आपकी तस्वीर थी, ताज़ी गेंदे की माला के साथ। उसके ठीक नीचे बैठे बाबू एक बुज़ुर्ग से कह रहे थे कि काग़ज़ पूरे नहीं हैं, अगले हफ़्ते आइए। बुज़ुर्ग ने बताया

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UPDATED: Friday, October 2, 2026

महात्मा गांधी

-Ayush Krsihna Tripathi

प्रिय महात्मा गांधी जी,

आज सुबह मैं तहसील दफ़्तर गया था, दीवार पर आपकी तस्वीर थी, ताज़ी गेंदे की माला के साथ। उसके ठीक नीचे बैठे बाबू एक बुज़ुर्ग से कह रहे थे कि काग़ज़ पूरे नहीं हैं, अगले हफ़्ते आइए। बुज़ुर्ग ने बताया कि यह उनका तीसरा चक्कर है। बाबू ने चाय का घूँट लिया और अगली फ़ाइल खोल ली। मैंने देखा कि बुज़ुर्ग के हाथ में जो फ़ॉर्म था, उसे वे पढ़ नहीं पा रहे थे। किसी ने उन्हें कह दिया था कि “सब भर दिया है”, और भरने वाले ने एक कॉलम छोड़ दिया था। मैं यह चिट्ठी उसी फ़ॉर्म के बारे में लिख रहा हूँ। सोचता हूँ कि आप आज लौटते तो क्या देखते, और सच कहूँ तो मुझे आपके सवालों से ज़्यादा अपने जवाबों की फ़िक्र है।

आप 30 जनवरी 1948 को गए। देश बँटवारे के ज़ख़्म लिए खड़ा था। उसके बाद अठहत्तर साल बीते हैं, और इन्हें बेकार कहना अन्याय होगा। 1951 की जनगणना में भारत की साक्षरता दर 18.33 प्रतिशत थी और उस दौर में औसत जीवन प्रत्याशा करीब 32 साल थी। 1951-52 के पहले आम चुनाव में साढ़े सत्रह करोड़ से ज़्यादा मतदाता थे, जिनमें बड़ी संख्या में लोग निरक्षर थे, और बाहर के कई विशेषज्ञ मानते थे कि यह प्रयोग टिकेगा नहीं। आज देश की साक्षरता 2011 की जनगणना के मुताबिक तीन-चौथाई के आसपास थी और औसत आयु भी उस दौर के मुकाबले काफ़ी बढ़ी है। 1943 के बंगाल अकाल को याद रखने वाला देश अब अनाज और दूध के उत्पादन में दुनिया के बड़े उत्पादकों में है। 1975 में आपातकाल लगा और 1977 में जनता ने उसे वोट से हटा दिया। 1991 के संकट के बाद खुली अर्थव्यवस्था ने करोड़ों लोगों को ग़रीबी से बाहर निकलने का अवसर दिया। हमारे यान मंगल और चंद्रमा तक गए। इसे नकारना बेईमानी होगी, और इसके नशे में रहना भी।

पर आपने कभी यह नहीं पूछा था कि देश कितना बड़ा हुआ। आपकी कसौटी थी कि सबसे कमज़ोर आदमी का चेहरा याद करो और सोचो कि तुम्हारे फ़ैसले से उसे क्या मिलेगा। हमने उस कसौटी को फ़्रेम में जड़ दिया और रोज़ के कामकाज में रखना भूल गए।

आपने कहा था कि भारत अपने गाँवों में बसता है। आज भी देश की आबादी का बड़ा हिस्सा गाँवों में रहता है, पर गाँव का बेटा सबसे पहले गाँव छोड़ने की सोचता है। मैं इसे उसका दोष नहीं मानता। जिस जगह स्कूल में मास्टर नहीं, अस्पताल में डॉक्टर नहीं और शाम को पढ़ने की कोई जगह नहीं, वहाँ से निकलना समझदारी लगती है। नतीजा यह कि गाँव धीरे-धीरे बूढ़ों और बच्चों का इलाक़ा बनता जा रहा है, और शहर में आया नौजवान नागरिक नहीं, दिहाड़ी का हाथ बनकर रह जाता है।

1992-93 में संविधान के 73वें और 74वें संशोधन ने पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा दिया और महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। आज ढाई लाख से ऊपर ग्राम पंचायतें हैं। सूचना का अधिकार है, मनरेगा है, शिक्षा का अधिकार है, खाद्य सुरक्षा क़ानून है। पेंशन और छात्रवृत्ति सीधे बैंक खाते में पहुँचती है, और जिसने पुराने दिनों में बिचौलिये को हिस्सा देकर पेंशन ली हो, वह इस फ़र्क़ को समझता है।

फिर भी तहसील का वह बुज़ुर्ग है। पोर्टल के लिए स्मार्टफ़ोन चाहिए, नेटवर्क चाहिए, ऐसा आधार चाहिए जिसमें अँगूठे का निशान पढ़ा जाए, और ऐसी भाषा जो उसे समझ आए। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर बोर्ड लगा है, पर डॉक्टर का पता नहीं। सरकारी स्कूलों में लगभग हर बच्चे का नाम दर्ज है, पर “असर” की रिपोर्टें साल दर साल दिखाती रही हैं कि पाँचवीं के बहुत-से बच्चे दूसरी कक्षा की किताब नहीं पढ़ पाते। 2024 की ASER रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी स्कूलों में पाँचवीं कक्षा के 44.8 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा के स्तर का पाठ पढ़ पा रहे थे। शिकायत दर्ज होती है और कुछ दिन बाद “निस्तारित” दिखने लगती है, चाहे समस्या जस की तस हो। कुछ चीज़ें काग़ज़ पर हो जाती हैं और ज़मीन तक नहीं पहुँचतीं।

यहाँ आपसे भी एक बात कहनी है। गाँव के बारे में आपकी भावुकता से डॉ. आंबेडकर सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि गाँव में जाति का बोझ है और वहाँ कमज़ोर के लिए जगह कम है। मुझे लगता है कि इस आपत्ति का पूरा जवाब आपके पास नहीं था। ग्राम स्वराज तब बनता है जब सरपंच की कुर्सी पर बैठी दलित महिला के पीछे उसका पति या गाँव का दबंग न खड़ा हो।

मैं आपको ग़लतियों से परे नहीं मानता। पर आपसे असहमत होकर कुछ सीखना माला चढ़ाने से मुश्किल काम है, इसलिए माला ही चढ़ती रही।

महात्मा गांधी के सवाल और गाँव का पुस्तकालय

गाँव की इस कहानी में मुझे सबसे ज़्यादा खटकने वाली कमी एक ऐसी चीज़ की लगती है जिसका कोई चुनावी घोषणापत्र में ज़िक्र नहीं करता: पुस्तकालय। सड़क, बिजली और पानी की बात हम करते हैं, और करनी भी चाहिए। पर जिस बुज़ुर्ग के हाथ में फ़ॉर्म था, उसे सबसे पहले चाहिए था कोई ऐसी जगह जहाँ वह बिना किसी की मेहरबानी के समझ सके कि उस काग़ज़ में लिखा क्या है।

उस बुज़ुर्ग का पोता, जो दसवीं में है, उसे चाहिए एक शांत कोना जहाँ घर के शोर से दूर बैठकर वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर सके, जिसके लिए कोचिंग की फ़ीस उसके पिता नहीं दे सकते। उसकी बहन को चाहिए ऐसी जगह जहाँ लड़की के किताब लेकर बैठने पर कोई ताना न दे। पुस्तकालय इन सबका जवाब है, और बहुत सस्ता जवाब।

एस. आर. रंगनाथन ने 1931 में पुस्तकालय विज्ञान के जो पाँच नियम गढ़े थे, उनमें पहला था कि किताबें इस्तेमाल के लिए हैं, और दूसरा कि हर पाठक को उसकी किताब मिले। नब्बे साल बाद भी हमारे ज़्यादातर गाँवों में पाठक के पास पहुँचने के लिए कोई किताब, कोई कुर्सी और कोई खुला दरवाज़ा नहीं है।

पुस्तकालय राज्यों के विषय हैं और अलग-अलग राज्यों में इनके लिए क़ानून और व्यवस्थाएँ अलग हैं। जहाँ बने हैं, वहाँ भी अक्सर ताला है, एक अधूरी अलमारी है और कर्मचारी की जगह एक रिक्त पद।

केरल का ग्रंथालय आंदोलन बताता है कि यह असंभव नहीं है। वहाँ गाँव-गाँव की वाचनशालाओं और पुस्तकालयों ने साक्षरता आंदोलन को जन-आंदोलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। केरल सरकार और केंद्र सरकार के दस्तावेज़ भी इस आंदोलन को राज्य के व्यापक साक्षरता अभियान से जोड़ते हैं।

आप ख़ुद पढ़ने-लिखने वाले आदमी थे। साबरमती आश्रम में जो अलमारियाँ थीं, वे सजावट के लिए नहीं थीं। आप जानते थे कि जिसे पढ़ना आता है, उसे ठगना मुश्किल होता है। इसीलिए मैं मानता हूँ कि आज का पुस्तकालय केवल किताबों की जगह नहीं हो सकता। उसे गाँव का ऐसा सार्वजनिक कमरा होना चाहिए जहाँ अख़बार हो, इंटरनेट हो, कोई फ़ॉर्म भरने में मदद करने वाला हो, महिलाओं के लिए बैठने की जगह हो, और बच्चों के लिए शाम को कहानियाँ। जहाँ जाति पूछकर कुर्सी न दी जाए।

ग्राम स्वराज की इमारत में पंचायत भवन के बग़ल में अगर यह कमरा न हो, तो हम स्वराज को सिर्फ़ चुनाव तक सीमित रखते हैं, और आप स्वराज को अपने भीतर के अनुशासन से भी जोड़ते थे।
आप संपादक थे। यंग इंडिया और हरिजन आपने चलाए, और आप जानते थे कि अख़बार की ताक़त क्या है और वह किस तरह बिक भी जाता है। आज किसी न्यूज़रूम में जाएँ तो पाएँगे कि शाम की बहस में सबसे ऊँची आवाज़ वाला जीतता है और शीर्षक की पहली शर्त यह है कि अँगूठा रुक जाए। जब पैमाना ध्यान बन जाए तो धीमी, जाँची हुई सच्चाई घाटे का सौदा हो जाती है।

तस्वीर इतनी काली भी नहीं। भारत में मार्च 2025 तक करीब 96.9 करोड़ इंटरनेट subscribers थे। गाँव की एक लड़की यूट्यूब से सिलाई सीखकर अपना काम चला रही है, और कई स्थानीय पत्रकार वह रिपोर्ट कर रहे हैं जो बड़े चैनल छोड़ देते हैं। पर यहीं पुस्तकालय की ज़रूरत फिर लौटती है। जिस फ़ोन पर सब कुछ मिल जाता है, उसी पर सब कुछ झूठ भी मिल जाता है, और कृत्रिम बुद्धि के दौर में तो आपकी आवाज़ में वह भाषण भी सुनाया जा सकता है जो आपने कभी दिया नहीं। इसकी काट केवल यह है कि लोग पढ़ने, परखने और सवाल करने की आदत सीखें। यह आदत स्क्रीन पर स्क्रॉल करने से नहीं, किसी किताब के साथ धीरज से बैठने से बनती है।

अहिंसा आपके लिए हाथ रोकने से आगे की बात थी। वाणी और विचार भी उसके दायरे में थे। इस पैमाने पर हम कमज़ोर पड़ते हैं। सड़कें शायद पहले से शांत हैं, पर फ़ोन की स्क्रीन पर रोज़ मोर्चा खुलता है। गालियाँ ट्रेंड करती हैं, किसी का अपमान लाखों व्यूज़ ले आता है। हम दूसरे धर्म, दूसरी जाति, दूसरी राय वालों को “वे लोग” कहने के इतने आदी हो गए हैं कि सामने वाला इंसान कम और शत्रु ज़्यादा दिखता है। बाज़ार में विनम्र और स्क्रीन पर हिंसक समाज को आप क्या कहते? मेरा अनुमान है कि इसका इलाज भी वही है: ऐसी जगहें जहाँ अलग-अलग लोग एक साथ बैठकर पढ़ें, और एक-दूसरे को पढ़ते हुए देखें।

आपसे एक बात अक्सर जोड़ी जाती है कि धरती सबकी ज़रूरतें पूरी कर सकती है, पर किसी एक का लालच नहीं। आज हर महीने नया मॉडल आता है, हर त्योहार पर सेल लगती है, और चलता हुआ फ़ोन भी “पुराना” लगने लगता है। उधर भूजल का हम दुनिया में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं और हमारे कई शहर सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में आते हैं। चाँद पर पहुँचने वाला देश और पानी के टैंकर के पीछे भागता मोहल्ला, दोनों एक ही भारत के हिस्से हैं। भारत के सबसे बड़े groundwater users में होने की बात सरकारी groundwater दस्तावेज़ों में दर्ज है।

मैं चरखे पर लौटने की बात नहीं कर रहा। बस इतना पूछ रहा हूँ कि कितना काफ़ी होगा। और यह सवाल सबसे आसानी से वहीं उठता है जहाँ लोग पढ़ते और सोचते हैं, विज्ञापन के सामने सिर्फ़ ख़रीदार बनकर नहीं बैठते।

अब तक मैं दूसरों की शिकायत करता रहा, पर मैं इस देश के बाहर नहीं खड़ा। प्रतियोगी परीक्षा की भागदौड़ में, नौकरी के डर में, किसी बेहतर शहर या बेहतर देश के सपने में, मैंने भी कितनी ही बार क़तार में खड़े दूसरे आदमी को अनदेखा किया है। मैं भी रात को ग़ुस्से में पोस्ट डालता हूँ और सुबह अच्छी बातें लिखकर ख़ुद को हल्का कर लेता हूँ। मेरे अपने गाँव की लाइब्रेरी का ताला बरसों से बंद है और मैंने कभी पंचायत में जाकर उसके बारे में नहीं पूछा। आज तहसील में बुज़ुर्ग को लौटाया गया, तब मैं भी चुप रहा, क्योंकि मुझे अपना प्रमाण-पत्र लेना था। अन्याय सिर्फ़ ताक़तवर की देन नहीं होता, हमारी छोटी-छोटी चुप्पियाँ भी उसमें हाथ बँटाती हैं।

आपके बाद भारत रुका नहीं। संस्थाएँ बनीं, अर्थव्यवस्था फैली, तकनीक आई। इसलिए यह पूछना ठीक नहीं कि आप आज प्रासंगिक हैं या नहीं। पूछना यह चाहिए कि आपके छोड़े सवालों के साथ हमने अठहत्तर साल क्या किया। उन्हें किताबों में छापा, नोटों पर छपवाया, चौराहों पर खड़ा किया, और अपने गाँव में जगह नहीं दी।

आज शाम तहसील की माला उतार ली जाएगी और तस्वीर वहीं टँगी रहेगी। कल सुबह वह बुज़ुर्ग फिर आएँगे, उसी अधूरे फ़ॉर्म के साथ। मैं सोचता हूँ कि अगर उनके गाँव में एक खुला पुस्तकालय होता, तो शायद वे तीसरी बार यहाँ न आते।

देखना यह है कि तस्वीर के नीचे बैठे लोगों में, और मुझमें भी, कौन उनसे पहली बार पूछता है कि बाबा, आपको क्या चाहिए।

आपका,
एक आज का युवा भारतीय

 

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