Bihar Missing Children: एक साल में 14,500 से ज्यादा बच्चों के लापता होने का आंकड़ा, पटना HC सख्त

Bihar Missing Children: बिहार में बच्चों के लापता होने का आंकड़ा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा पटना हाई कोर्ट में हुई एक सुनवाई से लगाया जा सकता है। अदालत को बताया गया कि राज्य में एक साल के दौरान 14,500 से ज्यादा बच्चों के लापता होने की

EDITED BY: thevocalbharat.com

UPDATED: Friday, September 18, 2026

Bihar missing children

Bihar Missing Children: बिहार में बच्चों के लापता होने का आंकड़ा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा पटना हाई कोर्ट में हुई एक सुनवाई से लगाया जा सकता है। अदालत को बताया गया कि राज्य में एक साल के दौरान 14,500 से ज्यादा बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट सामने आई। यह आंकड़ा बिहार के DGP के उस बयान के हवाले से सामने आया, जिसका जिक्र खुद पटना हाई कोर्ट ने अपने आदेश में किया है।

यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब कोर्ट नालंदा के एक अस्पताल से कथित तौर पर गायब हुए नवजात के मामले की सुनवाई कर रहा था। मामले में FIR दर्ज करने में करीब दो महीने की देरी और पुलिस की शुरुआती कार्रवाई को लेकर अदालत ने सख्त नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि बच्चों से जुड़े मामलों में शुरुआती समय बेहद अहम होता है और कार्रवाई में देरी बच्चे की तलाश को मुश्किल बना सकती है।
यहां यह साफ करना जरूरी है कि 14,500 का आंकड़ा बिहार में इस समय लापता बच्चों की कुल संख्या नहीं है। हाई कोर्ट के आदेश में DGP के हवाले से कहा गया है कि एक साल में 14,500 से ज्यादा बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट मिली थी। यानी यह एक साल के दौरान सामने आए मामलों का आंकड़ा है।
मामला नालंदा के एक अस्पताल से नवजात बच्चे के गायब होने का है। कोर्ट को बताया गया कि बच्चे के गायब होने के बाद FIR दर्ज करने में लगभग दो महीने की देरी हुई। इसी देरी को लेकर अदालत ने पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ नालंदा के जिला प्रशासन के रवैये पर भी सवाल उठाए।

Bihar Missing Children के आंकड़े के बीच नालंदा के नवजात मामले में क्या हुआ?

सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से कोर्ट को बताया गया कि मामले की जांच इस दिशा में भी की जा रही है कि कहीं नवजात को उठाने और बेचने में किसी अंतर-जिला या अंतर-राज्यीय गिरोह या बिचौलिये की भूमिका तो नहीं है। फिलहाल यह जांच का हिस्सा है और इस बारे में कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
बच्चे के पिता ने अदालत के सामने आरोप लगाया कि शुरुआत में पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज नहीं की और उन्हें करीब दो महीने तक एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ा। उन्होंने DNA टेस्ट के दौरान SHO पर धमकाने और शुरुआती जांच में सबूतों से छेड़छाड़ होने का भी आरोप लगाया। कोर्ट ने नालंदा के SP को इन आरोपों की जांच करने और यह पता लगाने का निर्देश दिया कि FIR दर्ज करने या समय पर कार्रवाई नहीं करने के लिए कौन अधिकारी जिम्मेदार था।

यही मामला सुनते हुए पटना हाई कोर्ट ने बिहार में Bihar Missing Children के बड़े आंकड़े पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि मानव तस्करी और नवजात बच्चों की बिक्री जैसे मामलों को लेकर कई सम्मेलन और बैठकें होती हैं, लेकिन अगर शिकायत मिलने के बाद पुलिस शुरुआती समय में ही सक्रिय नहीं होती तो बच्चे को ढूंढना बेहद मुश्किल हो सकता है।
कोर्ट ने पुलिस थानों की कमान ऐसे अधिकारियों को देने की जरूरत बताई जो बच्चों से जुड़े मामलों को लेकर संवेदनशील हों। अदालत ने अधिकारियों की तैनाती से पहले उनके रवैये और संवेदनशीलता को परखने के लिए “attitudinal test” की बात भी कही। संबंधित SHO को SIT से अलग कर दूसरी जगह भेजने का निर्देश भी दिया गया।

मामले में परिवार की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि कुछ लोग उनके घर पहुंचे और केस को समझौते के जरिए खत्म करने या वापस लेने का दबाव बनाया। कोर्ट ने इस आरोप की तत्काल जांच करने और आरोप सही पाए जाने पर FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। परिवार को सुरक्षा देने के लिए भी आदेश जारी किया गया।

पटना हाई कोर्ट की सुनवाई में सामने आया 14,500 से ज्यादा बच्चों के लापता होने का आंकड़ा बिहार में बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। खासकर तब, जब एक नवजात के मामले में शिकायत दर्ज करने में ही करीब दो महीने लग गए। अदालत की सख्ती के बाद अब इस मामले की जांच के साथ-साथ यह भी देखना अहम होगा कि Bihar Missing Children से जुड़े मामलों में पुलिस की शुरुआती कार्रवाई कितनी तेज और प्रभावी है।

 

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