SC कॉलेजियम ने पूर्व जजों को इलाहाबाद HC के एड-हॉक जज के रूप में नियुक्ति की सिफारिश की

न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों के बोझ को कम करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए SC कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिटायर्ड जजों की एड-हॉक नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। यह नियुक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 224A के तहत की गई है

EDITED BY: thevocalbharat.com

UPDATED: Wednesday, February 4, 2026

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न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों के बोझ को कम करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए SC कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिटायर्ड जजों की एड-हॉक नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। यह नियुक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 224A के तहत की गई है और इसकी अवधि दो वर्ष निर्धारित की गई है। यह फैसला मंगलवार को कॉलेजियम की बैठक में लिया गया, जिसे न्यायिक सुधारों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

SC की वेबसाइट पर जारी बयान

SC की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी बयान में कहा गया कि 3 फरवरी, 2026 को हुई कॉलेजियम की बैठक में इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए पांच सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को एड-हॉक जज के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई है। कॉलेजियम का मानना है कि इस कदम से हाईकोर्ट में लंबित मामलों, विशेषकर आपराधिक अपीलों के निपटारे में तेजी आएगी।
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किन जजों को मिली एड-हॉक नियुक्ति

कॉलेजियम की मंजूरी के बाद जिन रिटायर्ड जजों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में एड-हॉक जज नियुक्त किया गया है, उनमें शामिल हैं—

  1. जस्टिस मोहम्मद फैज आलम खान

  2. जस्टिस मोहम्मद असलम

  3. जस्टिस सैयद आफताब हुसैन रिजवी

  4. जस्टिस रेनू अग्रवाल

  5. जस्टिस ज्योत्सना शर्मा

इन सभी न्यायाधीशों को दो साल की अवधि के लिए एड-हॉक जज के रूप में कार्य करने की अनुमति दी गई है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मामलों की चुनौती

इलाहाबाद हाईकोर्ट देश के सबसे बड़े और व्यस्त हाईकोर्ट्स में से एक है। यहां वर्षों से मामलों का भारी बैकलॉग बना हुआ है, खासकर आपराधिक मामलों में स्थिति बेहद गंभीर है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, अकेले इलाहाबाद हाईकोर्ट में करीब 63,000 से अधिक आपराधिक अपीलें लंबित हैं। यही वजह है कि एड-हॉक जजों की नियुक्ति को समय की जरूरत माना जा रहा है।

अनुच्छेद 224A क्या कहता है

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 224A हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों को अस्थायी या एड-हॉक आधार पर फिर से नियुक्त करने का प्रावधान करता है। इसका उद्देश्य तब न्यायिक सहायता उपलब्ध कराना है, जब किसी हाईकोर्ट में मामलों का दबाव असामान्य रूप से बढ़ जाए। हालांकि, इस प्रावधान का इस्तेमाल बहुत सीमित परिस्थितियों में ही किया जाता रहा है।

2021 में तय हुई थीं गाइडलाइंस

साल 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 224A के तहत एड-हॉक जजों की नियुक्ति को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश तय किए थे। इन गाइडलाइंस में यह स्पष्ट किया गया था कि एड-हॉक जजों की नियुक्ति नियमित जजों की कमी को स्थायी रूप से पूरा करने का विकल्प नहीं हो सकती, बल्कि यह केवल लंबित मामलों के अस्थायी समाधान के लिए है।

जनवरी 2025 में संकेत मिला था बदलाव का

जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया था कि वह हाईकोर्ट्स में एड-हॉक जजों की नियुक्ति से जुड़ी शर्तों में कुछ ढील देने पर विचार कर सकता है। यह टिप्पणी उस समय आई थी, जब अदालत ने आपराधिक अपीलों के बढ़ते बोझ पर गंभीर चिंता जताई थी। कोर्ट का मानना था कि मौजूदा शर्तों के कारण एड-हॉक जजों की प्रभावी तैनाती में बाधा आ रही है।

विशेष बेंच के सामने उठा था मामला

यह मुद्दा तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली एक विशेष बेंच के समक्ष आया था। इस बेंच में जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस सूर्यकांत भी शामिल थे। बेंच ने माना था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक अपीलों की संख्या असामान्य रूप से अधिक है और इसके समाधान के लिए असाधारण कदम उठाने होंगे।

एड-हॉक जजों की भूमिका पर सुझाव

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह भी सुझाव दिया था कि एड-हॉक जजों की नियुक्ति के बाद आपराधिक अपीलों की सुनवाई की प्रक्रिया में बदलाव किया जा सकता है। आमतौर पर क्रिमिनल अपीलें हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने सूचीबद्ध होती हैं, लेकिन बेंच ने सुझाव दिया था कि एक नियमित सिंगल जज और एक एड-हॉक जज की संयुक्त बेंच भी इन मामलों की सुनवाई कर सकती है।

न्यायिक व्यवस्था को मिलेगी राहत

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से इलाहाबाद हाईकोर्ट को बड़ी राहत मिलेगी। अनुभवी रिटायर्ड जजों की वापसी से न केवल लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी, बल्कि न्याय की गुणवत्ता भी बनी रहेगी। साथ ही, इससे आम लोगों को वर्षों तक चलने वाले मुकदमों से राहत मिलने की उम्मीद है।

भविष्य में अन्य हाईकोर्ट्स में भी संभावना

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट में यह मॉडल सफल रहता है, तो अन्य हाईकोर्ट्स में भी एड-हॉक जजों की नियुक्ति का रास्ता खुल सकता है। इससे देशभर में न्यायिक लंबित मामलों की समस्या से निपटने में मदद मिल सकती है।

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