Budget 2026 केंद्र की राजनीति को लेकर लंबे समय से मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के बीच यह धारणा बनी रही है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार उन्हें हाशिए पर धकेल रही है। अक्सर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि सरकारी योजनाओं और संसाधनों में उनकी हिस्सेदारी धीरे-धीरे कम की जा रही है। खासकर बजट के समय यह बहस और तेज हो जाती है, क्योंकि वित्तीय आवंटन को सरकार की प्राथमिकताओं का आईना माना जाता है।
इसी पृष्ठभूमि में संसद में पेश हुआ केंद्रीय बजट 2026-27, जिसने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। इस बजट में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के लिए आवंटन बढ़ाया गया है, जिसे राजनीतिक और सामाजिक दोनों नजरिए से अहम माना जा रहा है।
Budget 2026-27 में क्या है खास?
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए Budget 2026-27 में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को लगभग 3,400 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। वर्ष 2025 में यह राशि 3,395.62 करोड़ रुपये थी। आंकड़ों के लिहाज से यह बढ़ोतरी भले ही मामूली दिखे, लेकिन इसके राजनीतिक और सामाजिक संकेत काफी बड़े माने जा रहे हैं।
सरकार ने यह साफ कर दिया है कि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के बजट में कोई कटौती नहीं की गई, बल्कि इसे स्थिर रखते हुए आगे बढ़ाया गया है। ऐसे समय में जब कई मंत्रालयों के बजट में संशोधन या कटौती देखने को मिलती है, यह कदम विशेष ध्यान खींचता है।

प्रतीकात्मक नहीं, नीतिगत संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि यह आवंटन केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक नीतिगत संदेश भी छिपा है। सरकार यह संकेत देना चाहती है कि उसकी प्राथमिकताओं में अल्पसंख्यक समुदायों का विकास और सशक्तिकरण अब भी शामिल है।
अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय शिक्षा, कौशल विकास, छात्रवृत्ति, आर्थिक सहायता और सामाजिक उत्थान से जुड़ी कई योजनाओं को लागू करता है। ऐसे में बजट का स्थिर या बढ़ा हुआ रहना यह दर्शाता है कि इन योजनाओं को जारी रखने की मंशा बनी हुई है।
मुस्लिम समुदाय में बजट को लेकर बदली चर्चा
बजट पेश होने के बाद मुस्लिम समुदाय और सामाजिक संगठनों के बीच चर्चा का स्वर भी बदला हुआ नजर आया। जहां पहले बजट से पहले आशंकाएं जताई जा रही थीं कि अल्पसंख्यक मंत्रालय के फंड में कटौती हो सकती है, वहीं अब बढ़े हुए आवंटन ने कई सवालों और धारणाओं को चुनौती दी है।
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि सरकार इस कदम के जरिए यह दिखाना चाहती है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सामाजिक विकास की योजनाएं प्रभावित नहीं होंगी। हालांकि, आलोचकों का यह भी कहना है कि सिर्फ बजट बढ़ाना काफी नहीं है, बल्कि ज़मीनी स्तर पर योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन ज्यादा अहम है।
राजनीतिक बहस का नया आयाम
बजट 2026-27 के बाद अल्पसंख्यक राजनीति पर नई बहस शुरू हो गई है। विपक्षी दल जहां इसे सरकार की “छवि सुधारने की कोशिश” बता रहे हैं, वहीं सत्तारूढ़ दल के नेताओं का कहना है कि आंकड़े खुद बोलते हैं और सरकार ने कभी अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव नहीं किया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में इस बजट आवंटन का इस्तेमाल दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क मजबूत करने के लिए करेंगे। एक ओर सरकार इसे अपनी समावेशी नीतियों का उदाहरण बताएगी, वहीं विपक्ष ज़मीनी हकीकत पर सवाल उठाएगा।
अल्पसंख्यक मंत्रालय की प्रमुख योजनाएं
अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के तहत कई अहम योजनाएं चलाई जाती हैं, जिनमें छात्रवृत्ति कार्यक्रम, मदरसा आधुनिकीकरण, कौशल विकास और आर्थिक सहायता से जुड़ी योजनाएं शामिल हैं। इन योजनाओं का सीधा लाभ मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी जैसे अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को भी मिलता है।
बजट में आवंटन बढ़ने से यह उम्मीद की जा रही है कि इन योजनाओं को और मजबूती मिलेगी और ज्यादा लाभार्थियों तक इनका दायरा बढ़ाया जा सकेगा।






