भारत में कैंसर एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। इंडियन कैंसर सोसाइटी (ICS) ने चेतावनी दी है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहे, तो वर्ष 2045 तक देश में हर साल सामने आने वाले नए कैंसर मामलों की संख्या 24.5 लाख से अधिक हो सकती है। फिलहाल यह आंकड़ा लगभग 15 लाख के आसपास है। आईसीएस का कहना है कि इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए केवल इलाज पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि समय पर जांच और रोकथाम को राष्ट्रीय रणनीति के केंद्र में लाना होगा।
ICS के अनुसार इलाज से आगे की सोच की जरूरत
ICS के अनुसार, भारत की कैंसर नीति अब भी मुख्य रूप से उपचार-केंद्रित है। हालांकि, आधुनिक चिकित्सा और दवाओं की उपलब्धता ने कई मामलों में मरीजों की जीवन प्रत्याशा बढ़ाई है, लेकिन कैंसर के बढ़ते बोझ को देखते हुए यह दृष्टिकोण अधूरा साबित हो सकता है। संस्था का मानना है कि यदि शुरुआती पहचान और रोकथाम पर जोर नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी दबाव पड़ेगा।

विशेषज्ञों ने बजट कदमों का किया स्वागत
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और कैंसर विशेषज्ञों ने बजट में किए गए इन प्रावधानों का स्वागत किया है। उनका कहना है कि दवाओं पर टैक्स में छूट से इलाज की लागत कम हो सकती है और घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता घटेगी। इससे न केवल मरीजों को फायदा होगा, बल्कि देश की स्वास्थ्य सुरक्षा भी मजबूत होगी।






