Ali Emran भारतीय सिनेमा में कश्मीर हमेशा से एक अहम विषय रहा है। कभी इसे जन्नत जैसी वादियों के रूप में दिखाया गया, तो कभी संघर्ष, हिंसा और राजनीतिक टकराव के प्रतीक के तौर पर। बीते कुछ वर्षों में कश्मीर पर बनी अधिकांश फिल्मों में आतंकवाद, सैन्य संघर्ष और राजनीतिक दृष्टिकोण ही केंद्र में रहे हैं। इस वजह से आम दर्शक के मन में कश्मीर की एक सीमित और नकारात्मक छवि बनती चली गई।
लेकिन कश्मीर केवल संघर्ष की धरती नहीं है। वहां एक जीवंत समाज है, अपनी संस्कृति है, भावनाएं हैं, रिश्ते हैं और रोजमर्रा की जिंदगियां हैं, जो अक्सर सिनेमा के परदे पर जगह नहीं बना पातीं। कश्मीर के जाने-माने फिल्म निर्माता Ali Emran इसी एकतरफा प्रस्तुति पर सवाल उठाते हैं और मानते हैं कि अब कश्मीरी समाज को एक नए नजरिए से दिखाने का समय आ गया है।
Ali Emran का नजरिया: सिनेमा सिर्फ राजनीति नहीं
Ali Emran का कहना है कि सिनेमा को केवल राजनीतिक विमर्श या सनसनी तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार,
“फिल्में समाज का आईना होती हैं। अगर हम सिर्फ हिंसा और टकराव दिखाएंगे, तो दुनिया कश्मीर को उसी चश्मे से देखेगी। जबकि सच्चाई इससे कहीं ज्यादा व्यापक और मानवीय है।”
वह मानते हैं कि सिनेमा का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन या मुनाफा कमाना नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर कला है, जो समाज को सोचने और समझने की दिशा दे सकती है। कश्मीर जैसे संवेदनशील विषय पर यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

परदे के पीछे छूट जाती हैं मानवीय कहानियां
कश्मीर में रहने वाले आम लोग—शिक्षक, छात्र, कारीगर, कलाकार, किसान और व्यापारी—हर दिन अपनी जिंदगी जीते हैं। उनके सपने, संघर्ष और खुशियां भी हैं, लेकिन मुख्यधारा की फिल्मों में उनकी कहानियां शायद ही कभी दिखाई देती हैं।
अली इमरान का मानना है कि कश्मीर की सबसे बड़ी ताकत उसका समाज है। वहां की लोककला, संगीत, हस्तशिल्प, सूफी परंपरा और आपसी भाईचारा ऐसी चीजें हैं, जिन्हें सिनेमा के जरिए दुनिया तक पहुंचाया जा सकता है।
उनके अनुसार, “अगर हम कश्मीर की मानवीय कहानियां दिखाएंगे, तो लोग वहां के लोगों से जुड़ाव महसूस करेंगे, न कि सिर्फ डर या सहानुभूति।”





