जमाअत-ए-इस्लामी हिंद (JIH) ने केंद्रीय बजट 2026–27 को लेकर वित्त मंत्रालय को एक विस्तृत और दूरदर्शी ज्ञापन सौंपा है। इसमें आर्थिक विकास को केवल जीडीपी तक सीमित न रखकर रोजगार, आय-सुरक्षा और सामाजिक न्याय से जोड़ने की बात कही गई है।
JIH में आर्थिक वृद्धि बनाम सामाजिक वास्तविकता
ज्ञापन में भारत की निरंतर जीडीपी वृद्धि और कॉरपोरेट मुनाफे को स्वीकार किया गया है, लेकिन साथ ही यह रेखांकित किया गया है कि इस प्रगति का लाभ समाज के बड़े हिस्से तक समान रूप से नहीं पहुंचा है। बढ़ती असमानता और कमजोर घरेलू मांग पर चिंता जताई गई है।JIH ने नीति निर्माण में रोजगार को मुख्य पैमाना बनाने का सुझाव दिया है। संगठन का कहना है कि बजटीय योजनाओं का मूल्यांकन उनके रोजगार प्रभाव के आधार पर भी होना चाहिए, न कि केवल वित्तीय आंकड़ों से।

शहरी और ग्रामीण रोजगार की रणनीति
शहरी क्षेत्रों में जलवायु-अनुकूल अवसंरचना और नागरिक सेवाओं से जुड़े रोजगार कार्यक्रमों की सिफारिश की गई है। वहीं ग्रामीण इलाकों के लिए जिला-स्तरीय विकास मॉडल अपनाकर गैर-कृषि रोजगार बढ़ाने पर जोर दिया गया है।सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते हुए, ज्ञापन में ऋण और प्रोत्साहनों को वास्तविक रोजगार सृजन से जोड़ने की मांग की गई है, खासकर महिलाओं और युवाओं के लिए।
कृषि आय स्थिरता पर जोर
JIH ने कृषि नीति में इनपुट सब्सिडी से आगे बढ़कर आय-स्थिरीकरण को केंद्र में रखने की बात कही है। मूल्य-अंतर भुगतान, फसल विविधीकरण और ऑफ-सीजन रोजगार को समाधान के रूप में सुझाया गया है।ज्ञापन में शिक्षित युवाओं की बेरोज़गारी को गंभीर चुनौती बताया गया है। इसके लिए भुगतानयुक्त अप्रेंटिसशिप, कौशल वजीफे और उद्योग-शिक्षा साझेदारी जैसे उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।
सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यक समावेशन
मुस्लिम समुदाय के लिए शिक्षा, रोजगार और ऋण तक पहुंच बढ़ाने वाले लक्षित हस्तक्षेपों की मांग की गई है। इसमें MSME भागीदारी और सार्वजनिक खरीद में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के सुझाव शामिल हैं।JIH ने अप्रत्यक्ष करों पर निर्भरता घटाकर प्रगतिशील प्रत्यक्ष कर प्रणाली को मजबूत करने की सिफारिश की है। साथ ही राज्यों की वित्तीय क्षमता बढ़ाने के उपाय भी सुझाए गए हैं।
निष्कर्ष और अपील
ज्ञापन का निष्कर्ष इस संदेश के साथ होता है कि बजट प्रक्रिया में नागरिक समाज और अल्पसंख्यक संगठनों की सक्रिय भागीदारी से ही समावेशी और संतुलित आर्थिक नीति संभव है।






