भारतीय मुक्केबाज़ी में मुस्लिम खिलाड़ियों का सफर: Nikhat Zareen का संघर्ष, समर्पण और सफलता

सोशल मीडिया पर वायरल Nikhat Zareen का ट्रेनिंग वीडियो सिर्फ़ फिटनेस नहीं, बल्कि ओलंपिक और कॉमनवेल्थ गेम्स की उनकी अटूट तैयारी और जुनून को दर्शाता है। तेलंगाना के निज़ामाबाद से विश्व चैंपियन बनने तक निखत का सफर आसान नहीं रहा। सामाजिक सोच, संसाधनों की कमी और चयन

EDITED BY: thevocalbharat.com

UPDATED: Wednesday, January 7, 2026

Nikhat Zareen

सोशल मीडिया पर वायरल Nikhat Zareen का ट्रेनिंग वीडियो सिर्फ़ फिटनेस नहीं, बल्कि ओलंपिक और कॉमनवेल्थ गेम्स की उनकी अटूट तैयारी और जुनून को दर्शाता है। तेलंगाना के निज़ामाबाद से विश्व चैंपियन बनने तक निखत का सफर आसान नहीं रहा। सामाजिक सोच, संसाधनों की कमी और चयन विवादों के बावजूद उन्होंने दो बार विश्व खिताब जीतकर खुद को साबित किया।
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संघर्षों से शिखर तक Nikhat Zareen का सफर

Nikhat Zareen आज उन लड़कियों की आवाज़ हैं, जो सामाजिक दबावों के कारण अपने सपनों से समझौता कर लेती हैं। उन्होंने दिखाया कि आस्था और खेल एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
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मोहम्मद हुसामुद्दीन: तकनीक और निरंतरता की मिसाल

तेलंगाना के नलगोंडा से आने वाले मोहम्मद हुसामुद्दीन भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ी का भरोसेमंद नाम हैं। एशियन चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ गेम्स में उनके पदक उनकी मेहनत का प्रमाण हैं। मणिपुर के मोहम्मद अली क़मर ने भारत को विश्व मुक्केबाज़ी में पहली पहचान दिलाई। आज कोच और मार्गदर्शक के रूप में उनकी भूमिका भारतीय महिला मुक्केबाज़ी की सफलता में अहम है। निखत, हुसामुद्दीन और क़मर की कहानियां बताती हैं कि पहचान, संसाधन या परिस्थितियां प्रतिभा को सीमित नहीं कर सकतीं।

बॉक्सिंग डे 2026 और भारतीय मुक्केबाज़ी का संदेश

भारतीय मुस्लिम मुक्केबाज़ों ने साबित किया है कि खेल समानता का सबसे बड़ा मंच है, जहां मेहनत हर चुनौती पर भारी पड़ती है।

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