अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump एक ओर खुद को वैश्विक शांति के पैरोकार के रूप में पेश करते हैं, वहीं दूसरी ओर वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ़्तारी ने दुनिया के कई विकासशील देशों को बेचैन कर दिया है। इस कदम ने न केवल लैटिन अमेरिका को हिलाया है, बल्कि भारत जैसे देशों के सामने भी कूटनीतिक दुविधा खड़ी कर दी है।
Donald Trump ,वेनेजुएला संकट और वैश्विक व्यवस्था में बढ़ती दरारें
भारत लंबे समय से “नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था” का समर्थन करता आया है। ऐसे समय में, जब अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने एक साथ टैरिफ और व्यापार को लेकर तनाव चल रहा है, वेनेजुएला का मामला भारत की विदेश नीति के लिए एक कठिन परीक्षा बन गया है। खासकर इसलिए, क्योंकि ग्लोबल साउथ के कई देश इस मुद्दे पर भारत की प्रतिक्रिया को ध्यान से देख रहे हैं।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में वेनेजुएला की स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए सभी पक्षों से शांतिपूर्ण संवाद के ज़रिये समाधान निकालने की अपील की है।

‘डॉनरो सिद्धांत’: मुनरो नीति का नया रूप?
वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप अचानक नहीं हुआ है। पिछले एक साल से इसके संकेत मिल रहे थे। वेनेजुएला के बाद अब कोलंबिया को लेकर भी अमेरिकी तेवर सख़्त होते दिख रहे हैं। नवंबर में जारी ट्रंप प्रशासन की रक्षा-नीति में साफ कहा गया था कि अमेरिका की पहली प्राथमिकता पश्चिमी गोलार्ध है। यह सोच उन्नीसवीं सदी के मुनरो सिद्धांत की आधुनिक व्याख्या जैसी है, जिसे विश्लेषक अब “डॉनरो सिद्धांत” कहने लगे हैं।
1823 में राष्ट्रपति जेम्स मुनरो द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत का मकसद था—अमेरिकी महाद्वीप में यूरोपीय शक्तियों के हस्तक्षेप को रोकना। इसके बदले अमेरिका ने यूरोप के आंतरिक मामलों से दूरी रखने का वादा किया था। लेकिन समय के साथ यह नीति लैटिन अमेरिका पर अमेरिकी प्रभुत्व का औज़ार बन गई।

मादुरो के बाद वेनेजुएला की अनिश्चित राह
निकोलस मादुरो का शासन तानाशाही के आरोपों से घिरा रहा, लेकिन उनके पतन के बाद अब बड़ा सवाल यह है कि वेनेजुएला किस दिशा में जाएगा। अगर देश में स्थिरता, लोकतंत्र और आर्थिक सुधार आते हैं तो यह सकारात्मक होगा, लेकिन अगर अराजकता फैली तो वेनेजुएला भी इराक, अफगानिस्तान और लीबिया की राह पर जा सकता है। अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद इन देशों में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रही, जिसका खामियाज़ा आम लोगों को भुगतना पड़ा।
ट्रंप ने लोकतांत्रिक चुनावों की बहाली पर ज़ोर देने के बजाय संक्रमण काल में अमेरिका द्वारा प्रशासन चलाने की बात कही है। आलोचकों का मानना है कि उनकी असली दिलचस्पी वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार में है, न कि वहां के नागरिक अधिकारों में।
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