कोठियां मजार को ‘नाव पर मजार’.. पानी के बीच मांगी जाती है मन्नत, जानें दिलचस्प कहानी

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में आस्था, इतिहास और स्थापत्य कला का एक ऐसा अनोखा संगम है, जो देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक चर्चा का विषय बना हुआ है। कांटी थाना क्षेत्र में स्थित कोठियां मजार, जिसे हज़रत इस्माइल शाह वारसी की दरगाह के नाम से जाना

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UPDATED: Wednesday, February 4, 2026

कोठियां मजार

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में आस्था, इतिहास और स्थापत्य कला का एक ऐसा अनोखा संगम है, जो देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक चर्चा का विषय बना हुआ है। कांटी थाना क्षेत्र में स्थित कोठियां मजार, जिसे हज़रत इस्माइल शाह वारसी की दरगाह के नाम से जाना जाता है, अपनी विशिष्ट बनावट के कारण सबसे अलग पहचान रखती है। यह दरगाह नाव के आकार में बनी हुई है और स्थानीय लोग इसे प्यार से ‘नाव पर मजार’ कहते हैं।

कोठियां मजार धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र

कोठियां मजार वर्षों से श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र रही है। यहां हर धर्म और समुदाय के लोग मन्नत मांगने और दुआ करने पहुंचते हैं। मान्यता है कि सच्चे दिल से मांगी गई मुराद यहां जरूर पूरी होती है। खास मौकों पर, विशेषकर उर्स के समय, दरगाह पर भारी संख्या में जायरीन जुटते हैं और पूरा इलाका धार्मिक रंग में रंग जाता है।
कोठियां मजार

हज़रत इस्माइल शाह वारसी से जुड़ी मान्यताएं

स्थानीय लोगों के अनुसार, हज़रत इस्माइल शाह वारसी एक सूफी संत थे, जिन्होंने मानवता, प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया। उनके जीवन से जुड़ी कई कथाएं आज भी लोगों के बीच प्रचलित हैं। कहा जाता है कि वे जरूरतमंदों की मदद करते थे और उनकी दुआ से लोगों की समस्याएं दूर होती थीं। उनके इंतकाल के बाद इसी स्थान पर मजार का निर्माण किया गया, जो धीरे-धीरे एक बड़े धार्मिक स्थल के रूप में विकसित हो गई।

नाव के आकार में क्यों बनी मजार?

कोठियां मजार की सबसे खास बात इसकी नाव जैसी संरचना है। इसके पीछे एक ऐतिहासिक और भौगोलिक कारण जुड़ा हुआ है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यह इलाका पहले अत्यधिक बाढ़-प्रभावित हुआ करता था। चारों ओर पानी ही पानी रहता था और गांव एक टापू की तरह दिखाई देता था। उस दौर में यहां पहुंचने के लिए नाव ही एकमात्र साधन थी।

बाढ़ से जुड़ा इतिहास और स्थापत्य की सोच

लगातार बाढ़ और जलभराव के कारण इस क्षेत्र का जीवन पूरी तरह पानी पर निर्भर था। लोगों की रोजमर्रा की आवाजाही, व्यापार और संपर्क सब कुछ नावों के सहारे होता था। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए मजार को नाव के आकार में बनाया गया, ताकि यह उस दौर की स्मृति और परिस्थितियों का प्रतीक बन सके। आज भी यह संरचना उस इतिहास की गवाही देती है।

अनोखी बनावट बनी आकर्षण का केंद्र

नाव के आकार में बनी यह मजार दूर से देखने पर सचमुच पानी में तैरती हुई नाव का आभास देती है। इसकी बनावट न केवल श्रद्धालुओं, बल्कि वास्तुकला और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों को भी आकर्षित करती है। देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले पर्यटक इस अनोखी दरगाह को देखने के लिए मुजफ्फरपुर पहुंचते हैं और इसे कैमरे में कैद करते हैं।

आस्था और संस्कृति का संगम

कोठियां मजार सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह गंगा-जमुनी तहजीब का भी प्रतीक है। यहां हिंदू, मुस्लिम और अन्य समुदायों के लोग समान श्रद्धा के साथ आते हैं। यह स्थल आपसी सौहार्द और सांस्कृतिक एकता की मिसाल पेश करता है, जहां धर्म से ऊपर इंसानियत को महत्व दिया जाता है।

समय के साथ बदला इलाका, लेकिन पहचान वही

हाल के वर्षों में बाढ़ की स्थिति पहले जैसी गंभीर नहीं रही और क्षेत्र में सड़कें व अन्य सुविधाएं विकसित हुई हैं। अब यहां तक पहुंचना आसान हो गया है, लेकिन इसके बावजूद ‘नाव पर मजार’ की पहचान आज भी उतनी ही मजबूत है। यह मजार लोगों को न केवल आस्था से जोड़ती है, बल्कि उन्हें अपने अतीत से भी रूबरू कराती है।

पर्यटन की दृष्टि से भी है खास

स्थानीय प्रशासन और पर्यटन से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि सही प्रचार और सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, तो कोठियां मजार धार्मिक पर्यटन का एक बड़ा केंद्र बन सकती है। इसकी अनोखी संरचना और इससे जुड़ी कहानी इसे बिहार के विशिष्ट स्थलों में शामिल करती है।

श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रतीक

आज भी जब श्रद्धालु मजार पर पहुंचते हैं, तो वे इसे केवल एक इमारत नहीं, बल्कि विश्वास और उम्मीद का प्रतीक मानते हैं। नाव के आकार में बनी यह दरगाह मानो यह संदेश देती है कि जैसे नाव मुश्किल हालात में भी इंसान को पार लगा देती है, वैसे ही आस्था जीवन की कठिनाइयों से बाहर निकाल सकती है।

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