बैंगलोर मेडिकल कॉलेज और रिसर्च इंस्टीट्यूट (BMCRI) में बीएससी (B.Sc.) एलाइड हेल्थ साइंसेज के सैकड़ों इंटर्न ने इंटर्नशिप स्टाइपेंड के तत्काल भुगतान और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन शुरू किया है। यह प्रदर्शन 4 फरवरी से बीएमसीआरआई कैंपस में जारी है, जिसमें बड़ी संख्या में इंटर्न शामिल हो रहे हैं।
इंटर्न का कहना है कि वे लंबे समय से बिना किसी वित्तीय सहायता के फुल-टाइम क्लिनिकल जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, लेकिन उनकी बार-बार की गई अपीलों का अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
RGUHS से जुड़े BMCRI इंटर्न का आरोप
राजीव गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज (RGUHS) से संबद्ध इन इंटर्न का कहना है कि उन्होंने कई वर्षों तक बिना भुगतान के काम किया है।BMCRI के बच्चे इसके बावजूद, न तो संस्थान स्तर पर और न ही प्रशासनिक स्तर पर उनकी समस्याओं का समाधान किया गया।
इंटर्न के अनुसार, यही कारण है कि उन्हें मजबूरी में विरोध का रास्ता अपनाना पड़ा। उनका कहना है कि यह प्रदर्शन किसी राजनीतिक या बाहरी दबाव में नहीं, बल्कि अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए किया जा रहा है।

बिना स्टाइपेंड के फुल-टाइम क्लिनिकल ड्यूटी
नाम न बताने की शर्त पर कई इंटर्न ने बताया कि एलाइड हेल्थ साइंसेज के छात्र तीन साल की अकादमिक पढ़ाई पूरी करने के बाद एक साल की अनिवार्य इंटर्नशिप करते हैं। इस अवधि में वे अस्पताल में नियमित स्टाफ की तरह काम करते हैं।
एक इंटर्न ने कहा,
“हम रोज़ आठ से बारह घंटे तक ड्यूटी करते हैं। डॉक्टरों की सहायता, लैब मैनेजमेंट, मरीजों की देखभाल और नाइट शिफ्ट—सब कुछ करते हैं, लेकिन बदले में हमें एक भी रुपया स्टाइपेंड नहीं मिलता।”
नियम होने के बावजूद भुगतान नहीं
इंटर्न का दावा है कि नेशनल काउंसिल फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशन ने इंटर्नशिप के दौरान स्टाइपेंड देने का स्पष्ट प्रावधान किया है। इसके बावजूद, बीएमसीआरआई में इस नियम को लागू नहीं किया जा रहा।
एक अन्य इंटर्न ने बताया,
“यह साल हमारे लिए आर्थिक और मानसिक रूप से बेहद थकाने वाला रहा है। बिना स्टाइपेंड के किराया, भोजन और ट्रांसपोर्ट जैसे बुनियादी खर्च पूरे करना भी मुश्किल हो जाता है।”
दूसरे संस्थानों से तुलना, असमान व्यवहार का आरोप
प्रदर्शन कर रहे इंटर्न ने यह भी आरोप लगाया कि उनके साथ अन्य सरकारी मेडिकल संस्थानों की तुलना में असमान व्यवहार किया जा रहा है। छात्रों के अनुसार, किदवई मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑन्कोलॉजी, IGICH, संजय गांधी इंस्टीट्यूट और जयदेवा इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों में एलाइड हेल्थ साइंसेज इंटर्न को स्टाइपेंड दिया जाता है।
एक छात्र ने कहा,
“हम भी वही काम करते हैं, वही जिम्मेदारियां निभाते हैं, लेकिन हमें स्टाइपेंड नहीं मिलता। यह साफ तौर पर भेदभाव है।”
हॉस्टल और बुनियादी सुविधाओं की कमी
इंटर्न ने यह भी बताया कि सरकारी हॉस्टल की सुविधा न होने से उनकी परेशानियां और बढ़ जाती हैं। अस्पताल के पास प्राइवेट मकानों में रहना महंगा पड़ता है, जिससे आर्थिक दबाव और बढ़ जाता है।
लंबे ड्यूटी घंटे, किराया और रोज़मर्रा के खर्चों की चिंता का असर उनकी मानसिक सेहत पर भी पड़ रहा है। इसके अलावा, छात्रों ने आरोप लगाया कि एलाइड हेल्थ साइंसेज कोर्स के लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर, अलग फैकल्टी और डेडिकेटेड अकादमिक बिल्डिंग जैसी सुविधाएं भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं।
सरकार की प्रतिक्रिया, प्रशासनिक सीमाओं का हवाला
विरोध प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया देते हुए मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि विभाग को इस मुद्दे की जानकारी है, लेकिन प्रशासनिक नियमों और संस्थागत ढांचे के कारण तुरंत समाधान निकालना आसान नहीं है।
अधिकारी ने स्वीकार किया कि कई वर्षों से इंटर्न को स्टाइपेंड नहीं मिला है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि लगातार विरोध प्रदर्शन से गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
इंटर्नशिप रद्द होने की चेतावनी
अधिकारी ने कहा,
“अगर नियमों को सख्ती से लागू किया गया, तो इंटर्नशिप रद्द हो सकती है, जिससे छात्रों की डिग्री और करियर प्रभावित हो सकते हैं। इसी वजह से अब तक उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई है।”
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इंटर्न को विरोध के लिए उकसाया गया हो सकता है, हालांकि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया गया।
ऑटोनॉमस और सरकारी संस्थानों का अंतर
बीएमसीआरआई और अन्य संस्थानों के बीच अंतर समझाते हुए अधिकारी ने कहा कि किदवई, संजय गांधी और जयदेवा जैसे संस्थान ऑटोनॉमस बॉडी हैं और अपनी फंडिंग के आधार पर स्टाइपेंड का फैसला कर सकते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि बीएमसीआरआई पूरी तरह कर्नाटक सरकार के नियंत्रण में है और इसकी सभी ग्रांट मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट से आती हैं, इसलिए यह स्वतंत्र रूप से ऐसे फैसले नहीं ले सकता।






